कहानी – परोपकार को कहीं भी भय नहीं

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एक गीदड़ एक दिन गड्ढे में गिर गया। बहुत उछल-कूद की किंतु बाहर न निकल सका। अंत में हताश होकर सोचने लगा कि अब इस गड्ढे में मेरा अंत हो जाना है। तभी एक बकरी को मिमियाते सुना। तत्काल ही गीदड़ की कुटिलता जाग उठी। वह बकरी से बोला-बहिन बकरी! यहाँ अंदर खूब हरी-हरी घास और मीठा-मीठा पानी है। आओ, जी भरकर खाओ और पानी पियो।’’ बकरी उसकी लुभावनी बातों में आकर गड्ढे में कूद गई।

चालाक गीदड़ बकरी की पीठ पर चढ़कर गड्ढे से बाहर कूद गया और हँसकर बोला-तुम बड़ी बेवकूफ हो, मेरी उपयोगितावश कोई न कोई निकाल ही लेगा किन्तु तुम निरुपयोगी को कोई न कोई निकालता। परोपकारी को कहीं भी भय नहीं होता है।’’ अपरोपकार का सार निष्फल ही चला जाता है!

प्यासा मनुष्य अथाह समुद्र की ओर यह सोचकर दौड़ा कि महासागर से जीभर अपनी प्यास बुझाऊँगा। वह किनारे पहुँचा और अंजलि भरकर जल मुँह में डाला किंतु तत्काल ही बाहर निकाल दिया।प्यासा असमंजस में पड़कर सोचने लगा कि सरिता सागर से छोटी है किंतु उसका पानी मीठा है। सागर सरिता से बहुत बड़ा है पर उसका पानी खारी है।

कुछ देर बाद उसे समुद्र पार से आती एक आवाज सुनाई दी-सरिता जो पाती है उसका अधिकांश बाँटती रहती है, किंतु सागर सब कुछ अपने में ही भरे रखता है। दूसरों को काम न आने वाले स्वार्थी का सार यों ही निःसार होकर निष्फल चला जाता है।’’ आदमी समुद्र के तट से प्यासा लौटने के साथ एक बहुमूल्य ज्ञान भी लेता गया जिसने उसकी आत्मा तक को तृप्त कर दिया।

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