गीताज्ञान में जाने कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग क्या क्या है?

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हरे कृष्ण। गीताज्ञान का मुख्य उद्देश्य है मनुष्य को सुख शान्ति से जीवन व्यतीत करने का मार्ग बताना और परमानन्द प्राप्ति के रास्ते पर ले जाना। उसके लिये भगवान ने मुख्य तौर से तीन रास्ते बताए हैं। इन्हें तीन योगों का नाम दिया गया है।
१ कर्मयोग
२ भक्तियोग
३ ज्ञानयोग
मोटे तौर पर यह माना जा सकता है कि गीता के ६-६ अध्यायों में इन योगों का वर्णन है। लेकिन  ऐसा नही है कि स्पष्ट तौर से यह बताया जा सके कि किन ६ अधाय्यों में  किस योग  का वर्णन । अलग अलग अध्यायों में अलग अलग योगों का वर्णन भी आता है।
     वास्तव में भक्तियोग मानने का है और ज्ञानयोग जानने का है और कर्मयोग निष्काम भाव से भौतिक वस्तुऔं का भोग संतुलित ढंग से उचित  मात्रा में करते हुए, सबके भलाई को धयान में रख कर, शास्त्रों में बताए गये कर्मों को करने को कर्म योग कहते हैं।
      ७वें अध्धाय में भक्तियोग का आरंभ हो रहा है। भगवान कृष्ण कहते हैं भक्तियोग तभी सफल होता है जब मनुष्य यह मान लेता है कि इस संसार का आदि और अंत भगवान ही है। जो कुछ हो रहा है उसके द्वारा ही संचालित है। स्वामि तुलसी दास के अनुसार
” को करि तर्क बढावहिं साखा
होहिं है वही जो राम रचि राखा”
स्वामि विवेकानन्द के शब्दों में
“The moving finger writes and having writ moves on,
Nor all the pity or wit lure it back half a line ,
Nor all the tears wash a word of it. “
जो मनुष्य ऐसा मान कर भगवान से सम्बन्ध जोड लेता है उसे परमानन्द की प्राप्ति हो सकती हैं। समाज में किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति से सम्बन्ध होने पर ही हमें बहुत ख़ुशी होती है फिर भगवान से सम्बन्ध जुड़ने से जो ख़ुशी होगी उसकी तो व्याख्या करना, समझाना या बताना भी संभव नहीं है। जब भगवान से हमारा सम्बंध जुड़ जाता है तो अपने पराए का, मान अपमान का, सुख दुख, दोस्त और दुश्मन का सब भेद समाप्त हो जाता है। और मनुष्य परमानन्द  की स्थिति प्राप्त कर लेता है।
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