रसोई का अंतर

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उत्तर भारतीय ग्रामीण इलाकों में आज भी यह परंपरा रही है कि घर पर किसी खास मेहमान के आने पर रोटी सब्जी दाल चावल जैसा नार्मल भोजन न बनाकर अतिथि के सम्मान में पूरी कचैरी आदि विशेष भोजन बनाया जाती है इसे आम बोलचाल में पक्की रसोई कहा जाता है। कच्ची और पक्की रसोई से जुडा एक रोचक घटना पिछले दिनों विनोवा जी के सहयोगी श्री गौतम बजाज जी से सुनने को मिला जब वे हरदोई सी एस एन कालेज मे एक इवेंट को अटेंड करने आये थे। उन्होंने यह वाकया बताया

सरदार पटेल एक बार संत विनोवा जी के आश्रम गये जहां उन्हे भोजन भी खाना करना था । आश्रम की रसोई में उत्तर भारत के किसी गांव से आया कोई साधक भोजन व्यवस्था से जुडा था। सरदार पटेल को आश्रम का विशिष्ठ अतिथि जानकर उनके सम्मान में साधक ने सरदार जी से पूछा लिये कि आप के लिये रसोई पक्की अथवा कच्ची । सरदार पटेल इसका अर्थ न समझ सके तो साधक से इसका अभिप्राय पूछा तो साधक ने अपने आशय को कुछ और स्पष्ठ करते हुये कहा कि वे कच्चा खाना खायेगे अथवा पक्का यह सुनकर सरदार जी ने तपाक से उत्तर दिया कि कच्चा क्यों खायेंगे पक्का ही खायेगे । खाना बनने के बाद जब पटेल जी की थाली में पूरी कचैरी जैसी चीजें आयीं तो सरदार पटेल ने सादी रोटी और दाल मांगी तो वह साधक उनके सामने आकर खडा हो गया और उन्हें बताया गया कि उन्ही के निर्देशन पर ही तो पक्की रसोई बनायी गयी थी। इस घटना के बाद ही पटेल उत्तर भारत की कच्ची और पक्की रसोई के अंतर को समझ पाये।

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