मानव क्या मै बन रहा हु राक्षस, इस बात मे गोर करना जरूरी हो गया हे

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 मानव क्या मै बन रहा हु राक्षस इस बात मे गोर करना जरूरी हो गया हे, की जो पौराणिक कहानियो मे राक्षस के बारे मे बताया गया हे। की वह किस तरह घमंड व लालच के चक्कर में आकर अपने आप को ताकतवर साबित करने के लिए कमजोर लोगों बेजुबान जानवरों को बिना किसी बिना किसी कसूर के मारते थे, उनमें इतना अधिक जुल्म करते थे कि मानव उनके जुल्मों से तंग आकर भगवान की शरण मे जातेे और भगवान इंसान के रूप में जन्म लेकर राक्षसों के अत्याचारों से इंसानों को बचाते, धीरे धीरे राक्षसों का अत्याचार दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा और भगवान को इंसानों की प्रजाति को बचाने के लिए राक्षसों का संहार करना पड़ा

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अब मनुष्य की प्रजाति खुशी-खुशी जीवन यापन करने लगी धीरे-धीरे कुछ समय बाद मनुष्य के अंदर अहकार ने जन्म लिया मनुष्य अपने आप को दुनिया में सबसे शक्तिशाली मानने लगा मनुष्य का अहंकार आज दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है मनुष्य यह तक भूल गया है जिस पृथ्वी को वह अपनी मां कहता है ओर वह उसमे सबसे ज्यादा हक़ अपना समझता, वह पृथ्वी सिर्फ उसकी ही माँ वह सभी जीव-जंतु , पेड़ – पौधे की माँ है उसमे जितना हक़ मनुष्य का है उतना ही सभी जीव जंतुओ भी है ओर यह हक़ उनसे कोई नहीं छीन सकता/

परंतु मनुष्य आज अपने घमंड लालच मे इतना अंधा हो गया है की वह अपनी इच्छा पूर्ति के लिए बेज़ुबान पशु पक्षीयो को मार रहा हे, पेड – पौधों को सरे आम काट है,जिससेक कई प्रजातियां विलुप्त हो है ओर कई विलुप्त
होने के कगार मे है, मनुष्य के अंदर एक राक्षस वाली प्रवर्ती ने जन्म ले लिया है, मनुष्य आज अपने अहंकार, लोभ, लालच के दलदल मे फसता ही जा रहा है, समय रहते उसे इस सत्य एहसास नहीं हुवा तो एक दिन मनु ष्य भी राक्षस बन जायेगा, ओर एक बार फिर भगवान को पृथ्वी मे जीवन बचाने के लिए मनुष्य की प्रजाति को ख़त्म करना जरूरी हो जायेगा,

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