गरीबों की मीठी नींद के लिए

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बात ठिठुरती सर्दी के दिनों की है। एक दिन बापू किसी काम से आश्रम की गौशाला की तरफ जा रहे थे। अचानक उनकी निगाह पेड़े के नीचे बैठे एक गरीब बालक पर पड़ी। उन्होंने बालक से बड़े स्नेह से पूछा- ‘इतनी तेज़ सर्दी है और तुम बिना ओढ़े ही यहां बैठे हो, क्या तुम्हारे पास गुदड़ी नहीं है?’

बालक ने रोते हुए कहा- ‘बापू जी! मैं बहुत गरीब हूँ। मेरे पास केवल एक फटी, पुरानी चादर है जिसका उपयोग रात्रि में सोते वक्त करता हूँ।’ बालक के मुख से ऐसी बात सुनकर बापू का चेहरा एकदम खिन्न हो उठा। वे अपने काम को छोड़कर उल्टे लौट आये। घर आकर उन्होंने ‘बा’ की मदद से एक गुदड़ी बनाने का निश्चय किया। अपने हाथों से रूई को धुना। फिर ‘बा’ और बापू ने मिलकर दो सूती साड़ियों को सीकर उसमें रूई भरी। थोड़ी ही देर में गुदड़ी हो गई तैयार। अब बापू उस गुदड़ी को लेकर उस बालक के पास पहुंचे। वह बालक एक मकान के बरामदे में सो रहा था। बापू ने बड़े स्नेह से अपने हाथों से वह गुदड़ी उसे उड़ा दी। बालक को सुबह सब कुछ मालूम हो गया।

दूसरे दिन जब बापू वापस गौशाला की तरफ जा रहे थे तो वह गरीब बालक उनके चरण छूकर बड़ी कृतज्ञता भरी दृष्टि से हाथ जोड़कर बोला- ‘बापू जी! रात में मुझे बहुत मीठी नींद आई…यह सुनकर बापू बहुत खुश हुए। इसके बाद तो बापू ने प्रण कर लिया कि वे आज से गरीबों की मीठी नींद के लिए एक गुदड़ी प्रतिदिन बनायेंगे। सच में बापू ने जैसा प्रण लिया वैसा करके भी दिखाया। उन्होंने भीषण सर्दियों की रात में देर देर तक जागकर कई गुदड़िया बनाई और गरीबों में बांट दी ताकि वे भी सुख से सोकर मीठी नींद का भरपूर आनंद ले सकें।

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