कभी बेचता था पारी पूरी आज बन गया है भारतीय टीम अंडर-19 का खास हिस्सा

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क्रिकेट न्यूज़ : भारत में ‘गुदड़ी का लाल’ नामक एक किस्सा बहुत प्रसिद्ध रहा है. यह उन लोगों के लिए प्रयुक्त होता है जो तमाम मुश्किलों और बाधाओं को चीरते हुए सफलता प्राप्त करते हैं. कुछ ऐसा ही हैं भारत के नए क्रिकेट स्टार यशस्वी जायसवाल जो एशिया कप अंडर-19 टूर्नामेंट में विजेता बनीं भारतीय टीम के लिए बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों में से एक हैं.

एशिया कप में यशस्वी तीन मैचों में 214 रन बनाकर सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज बने, जिसमें श्रीलंका के खिलाफ फाइनल में 85 रनों की पारी भी शामिल हैं. यशस्वी को उनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए एशिया कप सीरीज में उन्हें उन्हें मैन ऑफ द सीरीज चुना गया. यशस्वी आज जिस मुकाम पर हैं वहां तक वह ऐसे ही नहीं पहुंचे है बल्कि इसके लिए उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा था.

yashasvi jaiswal

आजाद मैदान मुंबई पर गोल गप्पे बेचा करते थे

उस समय यशस्वी सिर्फ 11 साल के थे, जब उन्होंने क्रिकेट के लिए उत्तर प्रदेश के छोटे से जिले भदोही से मुंबई जाने का निर्णय लिया. जब वह मुंबई आये तब उनके पास रहने के लिए कोई जगह नहीं थी. बताया जाता है, आर्थिक तंगहाली के दिनों में यशस्वी ने अपना खर्च चलाने के लिए आजाद मैदान मुंबई पर गोल गप्पे बेचा करते थे. इसके साथ ही वह मैचों की स्कोरिंग भी करते थे.

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कोच ज्वाला सिंह ने पहचानी प्रतिभा

वो क्रिकेट कोच ज्वाला सिंह थे जिन्हों एक दिन यशस्वी को तब खेलते देखा था, जब वह लगभग 12 साल के थे लेकिन बहुत सारी मुश्किलों से जूझ रहे थे. वह अच्छा खेलते थे लेकिन उनके पास कोई कोच नहीं था और मां-बाप भी साथ नहीं रहते थे. यशस्वी के कोच ज्वाला सिंह उनमें क्रिकेट की एक दीवानगी देखी और उनके खेल में निखार लाया.

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सचिन तेंदुलकर भी उनके प्रशंसक

ऐसा नहीं है कि, यशस्वी की प्रतिभा के दीवाने बस उनके कोच और साथी ही रहे हैं बल्कि क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर भी उनके प्रशंसक हैं. एक बार सचिन ने यशस्वी को अपने घर भी बुलाया था और खेल के गुर सिखाने के बाद खुद के हस्ताक्षर वाला एक बल्ला भी दिया था.

अपने संघर्षों को लेकर यशस्वी बताते हैं, ‘मैं सिर्फ यही सोचकर आया था कि मुझे बस क्रिकेट खेलना है और वह भी सिर्फ और सिर्फ मुंबई से. जब आप एक टेंट में रहते हैं तो आपके पास बिजली, पानी, बाथरूम जैसी सुविधाएं भी नहीं होती. मुझे गोलगप्पे बेचना अच्छा नहीं लगता था क्योंकि जिन लड़कों के साथ मैं खेलता था, जो सुबह मेरी तारीफ करते थे और शाम को मेरे पास गोल गप्पे खाने आते थे. मुझे ऐसा करने पर बहुत बुरा लगता था लेकिन मुझे यह करना पड़ा क्योंकि मुझे जरूरत थी.’

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