कथा सरितसागर – पार्वती-शिव-संवाद भाग -1

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भारतवर्ष के उत्तर में पर्वतराज हिमालय एक विशाल प्राकृतिक पहरेदार की तरह स्थित है। इसकी सुंदरता अपने आप में अनूठी है। इसके उत्तर में एक चोटी का नाम कैलास है, जिसकी शुभ्र स्वच्छ शोभा विश्वभर में विख्यात है। इसी कैलास पर्वत पर देवाधिदेव भगवान महादेव अपनी प्रियतमा पार्वती के साथ रहते हैं।

एक बार की बात है, भगवान शिव बैठे हुए थे, उस समय उसके पास कोई भी न था। यह देख पार्वती उनके समीप पहुंची तथा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करने लगीं। भगवान शिव समझ गए कि आज कोई विशेष बात होगी, इसीलिए पार्वती उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न कर रही हैं। उनके मन की बात जानने के लिए कुछ देर बाद भगवान शिव बोले: ”कहो प्रिये! क्या बात है? तुम मुझसे क्या चाहती हो? मैं तुम्हारे लिए क्या प्रिय कार्य कर सकता हूं?’’
पार्वती बोलीं, ‘‘प्राणनाथ! कोई विशेष बात नहीं, यूं ही…।“
”हां हां, कहो तो सही।“
”प्राणेश्वर, यदि आप प्रसन्न हैं तो कोई नई कथा सुनाने की कृपा करें।“

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पार्वती के इन शब्दों को सुन भगवान शिव के चेहरे पर मंद मुस्कान फैल गई और वे बोले, ”प्रियतमे! तुम तो भूतकाल, वर्तमान और भविष्य, तीनों कालों के विषय में सब कुछ जानती हो। मेरी समझ में नहीं आता आज तुम्हें नई कथा सुनने की क्या सूझी।“

”प्राणनाथ! बात को टालने का प्रयत्न न कीजिए; क्योंकि आप इस कला में बड़े चतुर हैं। यद्यपि आपका कथन सत्य है, तथापि आपके मुंह से कथा सुनने में बात ही कुछ और है। कहां आप और कहां मैं।“
भगवान शिव अपनी प्रियतमा की बात कैसे टाल सकते थे, अतः उन्हें प्रसन्न करने के लिए उन्होंने एक छोटी-सी कथा सुनानी चाही। भगवान शिव कथा सुनाने लगे,

एक बार ब्रह्मा विष्णु पृथ्वी पर घूमते हुए मुझसे मिलने के लिए हिमालय पर्वत पर आए और अनेक प्रकार से मेरी स्तुति करने लगे। अतः मैंने उनसे पूछा, ”हे विष्णु और ब्रह्मा! कहो, कैसे आगमन हुआ?“
यह सुनकर ब्रह्मा ने कहा, ”देवाधिदेव! मैं आपको अपने पुत्रा के रूप में देखना चाहता हूं।“

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”भगवान! मैं केवल यही चाहता हूं कि आप में मेरी अनन्य भक्ति सदा बनी रहे, इसके अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं चाहिए।“
इतनी कथा सुनाने के बाद भगवान शिव पार्वती से बोले, ”प्रिये! पूर्वजन्म में भी तुम मेरी ही अर्धांगिनी थी।“
भगवान के मुंह से यह सुन पार्वती आश्चर्य के साथ बोलीं, ”प्राणनाथ! यह कैसे? इस विषय में भी बताने की कृपा करें।“
उस समय तुम भी प्रजापति दक्ष की एक पुत्राी थीं। तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ। तुम्हारी अन्य बहिनें अन्य देवताओं की पत्नियां बनीं। इसके पश्चात कथा को विस्तार से सुनाते हुए शिव बोले.

एक बार दक्ष ने एक विशाल यज्ञ किया, जिसमें उसने मुझे छोड़ अपने सभी दामादों को आमंत्रित किया। तब तुमने उससे पूछा, ”हे पिता, आपने देवाधिदेव शिव को यज्ञ मेें क्यों नहीं बुलाया?“
दक्ष ने उत्तर दिया, ”वह शिव अपवित्रा नरकपालों की माला धारण करता है। इस पवित्रा यज्ञ में उसे नहीं बुलाया जा सकता है।“

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पति की निंदा तुमसे सहन नहीं हुई। तुमने विचार किया, ”जिस शरीर से पति की निंदा सुननी पड़े, उस शरीर को जीवित रखने से कोई लाभ नहीं“ अतः तुमने वहीं प्राण त्याग दिए। तुम्हारे देहांत का समाचार मिलने पर मैंने दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया। इसके बाद इस जन्म में तुम हिमालय की पुत्राी बनीं। इस जन्म के विषय में तो तुम जानती ही हो। मैं हिमालय पर तप कर रहा था, तुम्हारे पिता पर्वतराज हिमलाय ने तुम्हें मेरी सेवा का उत्तरदायित्व सौंप दिया।
शिव आगे बोले ”उसी समय स्वर्ग में देवता त्रिपुरासुर से बड़े दुःखी थे। उन्हें ज्ञात था कि त्रिपुर को मेरा पुत्रा ही मार सकता है। ऐसा विचार कर उन्होंने कामदेव को मुझे तपस्या से विचलित करने के लिए भेजा, ¯कतु मैंने उसे भस्म कर डाला। ऐसा होने पर भी तुम न डिगीं। अंत में मुझे तुम्हें पत्नी बनाना पड़ा।“

इतनी कथा सुनाने के बाद भगवान शिव मौन हो गए। पार्वती पूर्ण कथा सुनना चाहती थीं, अतः बनावटी गुस्से में बोलीं,
”मैं आपको अच्छी तरह जाती हूूं; एक स्त्राी गंगा को आप सिर पर धारण करते हैं और दूसरी स्त्राी संध्या को नमस्कार करते हैं, किन्तु  मेरी बात पर कोई ध्यान ही नहीं देते।“ ….

शेष अगले भाग 2 में पढ़ें :

 

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