कथा – कुबेर का अहंकार

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कुबेर को अपनी संपत्ति और ऐश्वर्य पर अहंकार हो गया था. वह अक्सर इसका दिखावा करते रहते थे. देवों पर धौंस जमाते थे. मौके-बेमौके ऐश्वर्य की डींगे हांकते रहते थे. एक बार कुबेर कैलाश पर शिवजी के दर्शनों के लिए गए. मस्तमौला भोले शंकर के सामने कुबेर को सीधे-सीधे शेखी बघारने की हिम्मत नहीं हो रही थी. औघड़दानी महादेव कुबेर के धाम सोने की अलकापुरी तो जाने से रहे लेकिन बिना वहां ले गए कुबेर अपना ऐश्वर्य भगवान को दिखाएं कैसे ?
कुबेर ने शिवजी को अलकापुरी ले जाने की तरकीब निकाली. कुबेर ने कहा- महादेव आपके आशीर्वाद से मैं एक विशाल भोज का आयोजन कर रहा हूं. इसमें सभी देव, यक्ष, नाग, किन्नर, गंधर्व आदि आमंत्रित हैं. लेकिन बिना आपके पधारे वह आयोजन अधूरा रह जाएगा. शिवजी तो अंतर्यामी ठहरे. उनसे कोई क्या छिपा सकता है. वह कुबेर के मन की बात समझ गए. उन्होंने सोचा कि इनका अभिमान चूर होना जरूरी है.

महादेव ने कहा- मैं तो कैलाश के अलावा कहीं जाता नहीं. इस तरह के आयोजनों से तो मुझे दूर रखो. अगर आप गणेशजी को बुला सकें तो अच्छा होगा. कुबेर बात का मर्म नहीं समझे, छूटते ही बोले- अवश्य प्रभु. गणों के साथ गणेश जी भी आएंगे. मैं उनसे विनती करूंगा.
महादेव ने कहा- कुबेर सोच-विचार कर निर्णय करिएगा. हमारे लंबोदर की खुराक कुछ ज्यादा है.

कई बार वह भोजन करना आरंभ करते हैं तो कई दिनों तक रूकते नहीं. कुबेर का अभिमान जागा- प्रभु मैंने जितना बड़ा आयोजन रखा है उतना बड़ा आयोजन आज तक किसी ने न तो किया है और न ही कर सकेगा. कुबेर गणेशजी को निमंत्रण देने गए. गणेश जी भी दिव्यदृष्टि से सारी बातें जान गए. उन्होंने निमंत्रण स्वीकार तो लिया लेकिन कुबेर को सावधान किया कि भोजन की कमी न होने पाए. कुबेर तिलमिला गए. उनका अभिमान सर चढ़कर बोला- गणेश जी अभी तो आप बालक हैं. मैं अलकापुरी में ऐसा प्रबंध करुंगा कि स्वयं प्रजापति भी अचंभित रह जाएंगे.
भोज में गणेश जी तब पहुंचे जब सारे देवता भोजन कर चुके थे. कुबेर ने गणेश जी को चिढ़ा दिया- गणेशजी मुझे तो लगता था कि आप आएंगे नहीं और मेरा भोजन बर्बाद हो जाएगा. आपके लिए तो अलग से प्रबंध करना पड़ता है. गणेश जी ने आसन लगाया और बोले- भोजन लाओ. आज मैं भरपेट भोजन करुंगा. गणेश जी ने खाना शुरू किया और थोड़ी देर में कुबेर की रसोई खाली हो गई.  नौकरों ने झटपट और भोजन पकाया. लंबोदर के सामने कुबेर के नौकर भोजन से भरी थाली रखकर खड़े भी नहीं हो पाते और गणेश जी आंख मूंदकर गटक जाते और नई फरमाइश कर देते. उनकी थाली खाली होने लगी. गणेश जी ने कहा- कुबेर आपके स्वादिष्ट पकवानों ने मेरी भूख जगा दी. मैं ठहर नहीं सकता. अगर भोजन नहीं मिला तो मैं आपको ही खा जाउंगा. कुबेर के पसीने छूट गए, प्राण खतरे में नजर आने लगे. मृत्यु को सामने देख वह ब्रह्माजी के शरण में भागे.
ब्रह्माजी ने कहा- कुबेर आपके अभिमान से यह सब हुआ है. अब शिवजी के अलावा कोई दूसरा नहीं बचा सकता आपको.
कुबेर कैलाश भागे और शिवजी के चरणों में लोट गए. अपने अपराध के लिए क्षमा मांगी और काल रूपी गणेश जी से रक्षा की प्रार्थना की. महादेव ने कहा- गणेशजी को पान से भरी थाली परोस दो. कुबेर ने अपने हाथों से पानों का बीड़ा सजाकर पूरी थाली गणेश जी के सामने रख दी. क्रोध में गणेश जी उसे गटक गए और भोजन की मांग करने लगे. बजाय और भोजन का प्रबंध करने के कुबेर चुपचाप हाथ जोड़ खड़े हो गए. गणेश जी कुबेर को दबोचने के लिए बढ़े तो ब्रह्माजी ने टोका.

ब्रह्माजी ने कहा- गजानन शास्त्रों के अनुसार अब आपका भोजन पूर्ण हो चुका. पान तो मुखशुद्धि है जो भोजने के बाद ग्रहण किया जाता है. आपने तो पान भी खा लिया. कुबेर को आप क्षमा कर अभयदान दें. कुबेर ब्रह्माजी का संकेत मिलते ही गणेश जी के पांव में लोट गए. ब्रह्मा के वचनों से गजानन का क्रोध शांत हो गया था. उन्होंने कुबेर को क्षमा कर दिया.

गजानन ने कुबेर को आशीर्वाद दिया कि मेरे आशीर्वाद से कभी तुम्हारा कोष खाली नहीं होगा. जिस प्रयोजन में तुम्हारा आह्वान किया जाएगा वह मेरे आशीर्वाद से निर्विघ्न रहेगा.

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