इतिहास-अमरनाथ यात्रा

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अमरनाथ यात्रा का जितना पौराणिक महत्व है, उतना ही ऐतिहासिक महत्व भी है। पुराण अनुसार, काशी में शिवलिंग दर्शन और पूजन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य से हजार गुना पुण्य देने वाले बाबा अमरनाथ के दर्शन हैं।

स्वामी विवेकानंद ने 1898 में 8 अगस्त को अमरनाथ गुफा की यात्रा की थी और बाद में उन्होंने कहा था, ‘बर्फ रूप में बने शिवलिंग में भगवान शिव स्वयं हैं। मैंने ऐसी सुन्दर, इतनी प्रेरणादायक कोई चीज नहीं देखी और न ही किसी धार्मिक स्थल का इतना आनंद लिया है।’

अंग्रेज लेखक लारेंस अपनी पुस्तक ‘वैली ऑफ कश्मीर’ में लिखते हैं, ‘पहले मट्टन के कश्मीरी ब्राह्मण अमरनाथ के तीर्थयात्रियों को यात्रा कराते थे। बाद में बटकुट में मलिकों ने यह जिम्मेदारी संभाल ली, क्योंकि मार्ग को बनाए रखना और गाइड के रूप में कार्य करना उनकी जिम्मेदारी थी।

वे ही बीमारों, वृद्धों की सहायता करते और उन्हें अमरनाथ के दर्शन कराते थे। इन्हें मौसम की जानकारी भी होती थी। आज भी चौथाई चढ़ावा इस मुसलमान गडरिये के वंशजों को मिलता है।

इतिहास में उल्लेख मिलता है कि 14वीं शताब्दी के मध्य से लगभग 300 वर्ष की अवधि के लिए अमरनाथ यात्रा बाधित रही। कश्मीर के शासकों में से एक ‘जैनुलबुद्दीन’ (1420-70 ईस्वी) ने अमरनाथ गुफा की यात्रा की थी।

अमरनाथ गुुफा श्रीनगर से करीब 145 किलोमीटर दूर है। समुद्र तल से यह क्षेत्र 3,978 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। बाबा अमरनाथ की गुफा 150 फीट ऊंची और करीब 90 फीट लंबी है। अमरनाथ यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए यहां पहुचंने के दो रास्ते हैं। एक पहलगाम होकर जाता है और दूसरा सोनमर्ग बालटाल से जाता है।

पहलगाम से अमरनाथ जाने का रास्ता सरल और सुविधाजनक समझा जाता है। बालटाल से अमरनाथ गुफा की दूरी 14 किलोमीटर है, लेकिन यह मार्ग पार करना मुश्किल होता है। इसी वजह से अधिकतर यात्री पहलगाम के रास्ते अमरनाथ जाते हैं।

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