गायत्री मंत्र का अर्थ और जपने के चमत्कारिक फायदे

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गायत्री सनातन एवं अनादि मंत्र है। पुराणों में कहा गया है कि ‘‘सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा को आकाशवाणी द्वारा गायत्री मंत्र प्राप्त हुआ था, इसी गायत्री की साधना करके उन्हें सृष्टि निर्माण की शक्ति प्राप्त हुई। गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप ही ब्रह्माजी ने चार मुखों से चार वेदों का वर्णन किया। गायत्री को वेदमाता कहते हैं। चारों वेद, गायत्री की व्याख्या मात्र हैं।’’

प्राचीन काल में ऋषियों ने बड़ी-बड़ी तपस्यायें और योग्य साधनायें करके अणिमा, महिमा आदि चमत्कारी ऋद्धि -सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उनके शाप और वरदान सफल होते थे तथा वे कितने ही अद्भुत एवं चमत्कारी सामर्थ्यों से भरे पूरे थे, इनका वर्णन इतिहास, पुराणों में भरा पड़ा है। वह तपस्यायें और योग -साधनायें गायत्री के आधार पर ही होती थीं। गायत्री महाविद्या से ही 84 प्रकार की महान् योग साधनाओं का उद्भव हुआ है।

गायत्री सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम मन्त्र है। जो कार्य संसार में किसी अन्य मन्त्र से हो सकता है, गायत्री से भी अवश्य हो सकता है। इस साधना में कोई भूल रहने पर भी किसी का अनिष्ट नहीं होता, इससे सरल, स्वल्प, श्रम साध्य और शीघ्र फलदायिनी साधना दूसरी नहीं है।

जप कैसे करे:
मंत्र जप के लिए दूसरा समय है दोपहर मध्यान्ह का। दोपहर में भी इस मंत्र का जप किया जाता है। इसके बाद तीसरा समय है शाम को सूर्यास्त के कुछ देर पहले मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप करना चाहिए। इन तीन समय के अतिरिक्त यदि गायत्री मंत्र का जप करना हो तो मौन रहकर या मानसिक रूप से जप करना चाहिए। मंत्र जप अधिक तेज आवाज में नहीं करना चाहिए।

मंत्र का सरल अर्थ –
ऊँ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो न: प्रचोदयात्।
ऊँ – ईश्वर
भू: – प्राणस्वरूप
भुव: – दु:खनाशक
स्व: – सुख स्वरूप
तत् – उस
सवितु: – तेजस्वी
वरेण्यं – श्रेष्ठ
भर्ग: – पापनाशक
देवस्य – दिव्य
धीमहि – धारण करे
धियो – बुद्धि
यो – जो
न: – हमारी
प्रचोदयात् – प्रेरित करे

सभी को जोड़ने पर अर्थ है – उस प्राणस्वरूप, दु:ख नाशक, सुख स्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देव स्वरूप परमात्मा को हम अन्तरात्मा में धारण करें। वह ईश्वर हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे।

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इस मंत्र के जप से हमें यह लाभ प्राप्त होते हैं…

उत्साह एवं सकारात्मकता, त्वचा में चमक आती है, तामसिकता से घृणा होती है, परमार्थ में रूचि जागती है, पूर्वाभास होने लगता है, आर्शीवाद देने की शक्ति बढ़ती है, नेत्रों में तेज आता है, स्वप्र सिद्धि प्राप्त होती है, क्रोध शांत होता है, ज्ञान की वृद्धि होती है।

  • मिलती है दिमागी शांति : मंत्र जप के लिए दूसरा समय है दोपहर मध्यान्ह का। दोपहर में भी इस मंत्र का जप किया जाता है। इसके बाद तीसरा समय है शाम को सूर्यास्त के कुछ देर पहले मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप करना चाहिए। इन तीन समय के अतिरिक्त यदि गायत्री मंत्र का जप करना हो तो मौन रहकर या मानसिक रूप से जप करना चाहिए। मंत्र जप अधिक तेज आवाज में नहीं करना चाहिए।
  • बढ़ती है एकाग्रता: द इंटरनेशनल जर्नल ऑफ योगा के छपी एक स्टडी बताती है कि नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जाप करने वाले व्यक्ति की न सिर्फ याददाश्त तेज होती है, बल्कि वह अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक एकाग्र भी होता है। दरअसल, जब आप गायत्री मंत्र का जाप करते हैं तो उसके वाइब्रेशन से आपके सिर व चेहरे में मौजूद तीनों चक्र सक्रिय हो जाते हैं। और यह तीनों चक्र सीधे रूप से आपके मस्तिष्क, आंखों, साइनस, सिर के निचले हिस्से और थायराइॅड ग्रंथि से जुड़े होते हैं जो एकाग्रता में सुधार लाने के लिए जिम्मेदार होते हैं।

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  • संतान संबंधी परेशानियां दूर करने के लिए: किसी दंपत्ति को संतान प्राप्त करने में कठिनाई आ रही हो या संतान से दुखी हो अथवा संतान रोगग्रस्त हो तो प्रात: पति-पत्नी एक साथ सफेद वस्त्र धारण कर यौं बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। संतान संबंधी किसी भी समस्या से शीघ्र मुक्ति मिलती है।
  • सुधरता है श्वसन तंत्र: जब आप गायत्री मंत्र का जाप करते हैं तो उस समय आप अमूमन डीप ब्रीदिंग करते हैं। डीप ब्रीदिंग के कारण आपके फेफड़ों तक पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन पहुंचती हैं तथा आपके शरीर में ब्लड सप्लाई भी बेहतर तरीके से होती है। इस प्रकार धीरे−धीरे यह मंत्र आपके श्वसन तंत्र मं भी सुधार लाता है।
  • मिलता है स्वस्थ ह्दय: यह तो आपने समझ लिया कि गायंत्री मंत्र आपके श्वसन तंत्र को सुधारकर आपके शरीर में रक्त संचरण की प्रक्रिया को बेहतर बनाता है। जिसका एक सकारात्मक असर आपके ह्दय पर भी पड़ता है। जब पूरे शरीर में रक्त संचरण अच्छा होता है तो आपका दिल भी बेहतर तरीके से पंप होता है। इसके कारण आपको दिल की बीमारी होने का खतरा बेहद कम हो जाता है।
  • विद्यार्थीयों के लिए- गायत्री मंत्र का जप सभी के लिए उपयोगी है किंतु विद्यार्थियों के लिए तो यह मंत्र बहुत लाभदायक है। रोजाना इस मंत्र का एक सौ आठ बार जप करने से विद्यार्थी को सभी प्रकार की विद्या प्राप्त करने में आसानी होती है। विद्यार्थियों को पढऩे में मन नहीं लगना, याद किया हुआ भूल जाना, शीघ्रता से याद न होना आदि समस्याओं से निजात मिल जाती है।
  • डिप्रेशन का खतरा नहीं: यह तो हम सभी जानते हैं कि मॉडर्न युग में मनुष्य को तनाव, चिंताएं व अवसाद सौगात में मिला है। काम के बढ़ते बोझ के कारण उसकी खुशियां कहीं गुम हो गई हैं। ऐसे में गायत्री मंत्र का जाप करना आपके लिए लाभदायक हो सकता है। चूंकि गायत्री मंत्र आपको मानसिक रूप से शांति प्रदान करता है, इसलिए इससे आपको चिंता या अवसाद का शिकार नहीं होना पड़ता। जब मनुष्य आंतरिक रूप से शांत व खुशी का अनुभव करता है तो बाहर की चिंताएं उसके शरीर या मन को प्रभावित नहीं कर पातीं।
  • दरिद्रता के नाश के लिए:  यदि किसी व्यक्ति के व्यापार, नौकरी में हानि हो रही है या कार्य में सफलता नहीं मिलती, आमदनी कम है तथा व्यय अधिक है तो उन्हें गायत्री मंत्र का जप काफी फायदा पहुंचाता है। शुक्रवार को पीले वस्त्र पहनकर हाथी पर विराजमान गायत्री माता का ध्यान कर गायत्री मंत्र के आगे और पीछे श्रीं सम्पुट लगाकर जप करने से दरिद्रता का नाश होता है। इसके साथ ही रविवार को व्रत किया जाए तो ज्यादा लाभ होता है।
  • शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए: यदि कोई व्यक्ति शत्रुओं के कारण परेशानियां झेल रहा हो तो उसे प्रतिदिन या विशेषकर मंगलवार, अमावस्या अथवा रविवार को लाल वस्त्र पहनकर माता दुर्गा का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र के आगे एवं पीछे क्लीं बीज मंत्र का तीन बार सम्पुट लगाकार एक सौ आठ बार जाप करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। मित्रों में सद्भाव, परिवार में एकता होती है तथा न्यायालयों आदि कार्यों में भी विजय प्राप्त होती है।
  • विवाह कार्य में देरी हो रही हो तो : यदि किसी भी जातक के विवाह में अनावश्यक देरी हो रही हो तो सोमवार को सुबह के समय पीले वस्त्र धारण कर माता पार्वती का ध्यान करते हुए ह्रीं बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर एक सौ आठ बार जाप करने से विवाह कार्य में आने वाली समस्त बाधाएं दूर होती हैं। यह साधना स्त्री पुरुष दोनों कर सकते हैं।
  • यह भी हैं फ़ायदा: किसी भी शुभ मुहूर्त में दूध, दही, घी एवं शहद को मिलाकर एक हजार गायत्री मंत्रों के साथ हवन करने से चेचक, आंखों के रोग एवं पेट के रोग समाप्त हो जाते हैं। इसमें समिधाएं पीपल की होना चाहिए। गायत्री मंत्रों के साथ नारियल का बुरा एवं घी का हवन करने से शत्रुओं का नाश हो जाता है। नारियल के बुरे मे यदि शहद का प्रयोग किया जाए तो सौभाग्य में वृद्धि होती हैं।
  • यदि किसी रोग के कारण परेशानियां हो तो : यदि किसी रोग से परेशान है और रोग से मुक्ति जल्दी चाहते हैं तो किसी भी शुभ मुहूर्त में एक कांसे के पात्र में स्वच्छ जल भरकर रख लें एवं उसके सामने लाल आसन पर बैठकर गायत्री मंत्र के साथ ऐं ह्रीं क्लीं का संपुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। जप के पश्चात जल से भरे पात्र का सेवन करने से गंभीर से गंभीर रोग का नाश होता है। यही जल किसी अन्य रोगी को पीने देने से उसके भी रोग का नाश होता हैं।

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