कर्ण के बारे में अनसुनी रोचक बातें

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कर्ण महाभारत में एक ऐसे प्रसिद्ध पात्र थे जिनको युगों युगों तक जाना जाता है | कर्ण को सूत पुत्र के नाम से भी जाना जाता है, पर वास्तविकता ये थी की कर्ण के माता और पिता कुंती और सूर्य थे | कर्ण को महाभारत का सबसे बड़ा महायोद्धा के रूप में भी जाना जाता था | कर्ण दानवीर के नाम से भी प्रसिद्ध थे, कहा जाता है की आज तक कोई भी इनके पास से खाली हाथ वापस नहीं लौटा जिसका फ़ायदा उठा कर इंद्र ने भिक्षुक बन कर उसके कवच और कुंडल भिक्षा में मांग लिए जिससे महाभारत के युद्ध में अर्जुन की विजय हुई थी |

कर्ण को अपने ही मां ने त्याग दिया था

कुंती के कुवारा अवस्था के दरमियान दुर्वासा ऋषि उनके यहाँ आए थे, और वे अपनी दिव्यदृष्टी से देख लिए थे की पांडू और कुंती के कभी संतान नहीं हो सकते है | तभी कुंती की सेवा भाव से प्रसन होकर दुर्वासा ऋषि ने कुंती को एक वरदान दिया की किसी भी देवता के स्मरण करने से संतान की प्राप्ति हो सकती है | इस वरदान की उत्सुकता को कुंती ज्यादा दिन रोक नहीं सकी और विवाह से पहले सूर्य देव को स्मरण कर एक पुत्र की उत्पति की जो सूर्य के समान तेज था और कवच और कुंडल पहने हुए था | कुंती लोक लाज के कारण बच्चे को अपने पास ना रख कर गंगा में बहा दी | पानी में बहते हुए बच्चे को अधिरथ और राधा ने देखा जो महाराज धृतराष्ट्र का सारथी था और उनका कोई भी संतान नहीं था तो उसने इस बच्चे को गोद ले लिया और उस बच्चे का लालन पालन किया |

कर्ण जन्म के समय से ही कवच और कुंडल धारण किये हुए थे, जिसके रहते कर्ण को किसी भी शस्त्र से मारा नहीं जा सकता था |
कर्ण की दानवीरता से अर्जुन भी प्रभावित हुए

जब अर्जुन ने कृष्ण से पूछा की युद्धिष्ठिर को धर्मराज परन्तु कर्ण को दान वीर क्यों कहा जाता है | इस पर कृष्ण ने अर्जुन को कुछ नहीं बोला और दोनों ब्राह्मण भेष में पहले युद्धिष्ठिर के पास गये और बोले की मुझे चन्दन की लकडी खाना बनाने के लिए चाहिए | बारिश होने के कारण युद्धिष्ठिर को सुखा लकडी नहीं मिली तो युद्धिष्ठिर बोले की मुझे माफ़ करना बारिश के कारण सारी लकड़ियाँ गीली है, जो जलावन के लिए उपयुक्त नहीं है | इसके बाद दोनों युद्धिष्ठिर के पास से खाली हाथ वापस लौट गए | इसके बाद दोनों कर्ण के पास गये कर्ण भी बारिश के कारण उन्हें सुखी लकड़ी नहीं पाते है, तभी दोनों वापस लौटने लगते है तो कर्ण दोनों को रोकते है और अपनी तीर की मदद से चन्दन की बनी दरवाजे को तोड़ कर दोनों को दे कर विदा करते है |

3 महाश्राप जो बनी कर्ण की मौत का कारण

1) कर्ण की शिक्षा के लिए अधिरथ पितामह भीष्म के पास गये परन्तु पितामह राज गुरु होने के करना कर्ण को शिक्षा देने से साफ इंकार कर दिया | तब कर्ण परशुराम के पास गये जो सिर्फ ब्राह्मणों को ही शिक्षा देते थे | ऐसे में कर्ण परशुराम से झूठ बोलकर शिक्षा प्राप्त की | परन्तु जब परशुराम को पता चला की कर्ण ब्राह्मण नहीं है तो परशुराम गुस्सा हो कर कर्ण को श्राप दिया की, “तुम जो शिक्षा मुझसे झूठ बोलकर लिए हो वो शिक्षा जब तुम्हे अति आवश्यक होगी तब तुम अपनी सारी विद्या भूल जावोगे”|

2) परशुराम के आश्रम से निकलने के पश्चात् कर्ण शब्दभेदी का ज्ञान ले रहा था और इसी क्रम उसने एक बछड़े को मार दिया जिससे रुस्ठ हो कर गाय के मालिक ब्राह्मण ने श्राप दिया की, “तुमने असहाय पशु को मारा है ठीक इसी प्रकार तुम्हारी भी मृत्यु होगी, उस वख्त तुम सबसे असहाय होगे और तुम्हारा ध्यान शत्रु पर नहीं कही और होगा |

3) लोक कथावो के अनुसार कर्ण एक बार कही भ्रमण पर निकले थे, राश्ते में उन्होंने देखा की एक लडकी अपने घड़े से घी बिखर जाने के कारण रो रही थी, जब कर्ण ने रोने का कारण पूछा तो लड़की बतलाई की उसे भय है की उसकी सौतेली माँ उसके इस काम से काफी गुस्सा होगी | इसपर कर्ण ने उससे कहा की वे उसे नया घी दिलाएँगे तो लड़की ने कहा की उसे वही मिटटी में मिली घी ही चाहिए | तब कर्ण ने घी सोखी हुई मिटटी को हथेली में ले कर जोर से दबाने लगा तभी किसी महिला की करुण ध्वनि सुनाई पड़ी, हथेली खोल कर देखा तो वो धरती माता थी | घोर पीड़ा के कारण धरती माता ने कर्ण को श्राप दी की जिस प्रकार तुम मुझे अपने हथेली में जाकड रखे हो ठीक उसी प्रकार युद्ध में तुम्हारे रथ के पहियों को जकड लुंगी |

झूठ बोलने पर परशुराम जी ने कर्ण को श्राप दिया था की वह जरुरत पड़ने पर अपनी सारी अस्त्र विद्या भूल जाएगा |
बछड़े को मरने पर ब्राह्मण ने श्राप दिया था की जब तुम बिलकुल असहाय रहोगे, तभी तुम्हे तुम्हारा शत्रु मार देगा और उस वख्त तुम्हारा ध्यान कही और होगा |
धरती माता द्वारा ये श्राप दिया गया था की जिस प्रकार से तुम मुझे अपने हथेली में जकडे हो ठीक उसी प्रकार युद्ध के समय मै तुम्हारे रथ के पहिये को जकड लुंगी |
कर्ण जैसा मित्र कोई नहीं हुआ

भरोसेमंद दोस्त

हस्तिनापुर में राजकुमारों के शिक्षा के बाद गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों की कौशलता के लिए एक रंगभूमि का आयोजन करवाए | जिसमे अर्जुन धनुर्धन प्रभावित हुए, अर्जुन के कारनामे को पार करते हुए तभी कर्ण ने अर्जुन को एक द्वन्दवयुद्ध की चुनौती दी, परन्तु कृपाचार्य ने ये कह कर चुनौती ठुकरा दी की राजकुमार को सिर्फ एक राजकुमार ही चुनौती दे सकता है | तभी दुर्योधन कर्ण को अंग देश का राजा घोषित किया और इस प्रकार दुर्योधन और कर्ण की मित्रता हुई | उसके बाद कर्ण दुर्योधन के सभी कार्यो में सहायता भी करता |

कर्ण को अंग देश का राजा बनाने के कुछ दिन बाद दोनों दुर्योधन और कर्ण शाम को बैठ कर पासा खेल रहे थे, तभी अचानक दुर्योधन को को कुछ क्षण के लिये बाहर जाना पड़ा, उस वख्त दुर्योधन की पत्नी भानुमती पास से गुजर रही थी | उसने देखा की कर्ण दुर्योधन का इंतजार कर रहे है तो वो वह अपने पति के खेल को जारी रखने के लिए गई और उनके बीच पासा फेकने को ले के कहा सुनी हो गयी | तभी कर्ण पासा पर झपटा जिसके कारण भानुमती का पल्लू और कान की बाली और गले की हार जमीन पर गिर जाता है और उसी वख्त दुर्योधन वह पहुच जाता है | दुर्योधन ये देख कर कर्ण से कारण पुछा और कारण जान कर जोर से हस पड़ा |

कर्ण के जाने के बाद भानुमती ने दुर्योधन से पुछा आप मेरी अवस्था को देखकर किसी प्रकार की संदेह नहीं हुई, तो दुर्योधन ने जवाब दिया की रिश्ते में किसी प्रकार के संदेह का कोई गूंजाइश नहीं, और जहाँ संदेह है वहा रिश्ता नहीं होता | और कर्ण मेरा सबसे अच्छा दोस्त है और मुझे भरोशा है की वो मेरा कभी भी भरोशा नहीं तोड़ेगा |

कर्ण की उदारता

दुर्योधन द्वारा कर्ण को अंग देश का राजा घोषित करने के बाद, कर्ण ने एक घोषणा की, की सुर्यदेव के पूजा के बाद जो भी व्यक्ति कुछ भी मांगेगा, उसे कभी भी इनकार नहीं करेगा और इसके साथ मांगने वाले कभी भी खाली हाथ वापस नहीं जाएगा | इस बात का फ़ायदा उठाते हुए इंद्र कर्ण से उसके जीवन रक्षक कवच और कुंडल मांग लिए |
कुंती अपने पांचो बेटो की जिन्दगी मांगी, इसपर कर्ण ने वचन दिया की आपके पांच पुत्र अवश्य जीवित रहेंगे और वह अर्जुन को छोड और किसी पांडव का वध नहीं करेंगे |
युद्ध के समय कर्ण को चारो पांडवो को मरने का कई बार अवसर मिला, परन्तु कर्ण ने अपना वचन निभाते हुए उन्हें कभी क्षति नहीं पहुचाई |
कर्ण ने कारवो के साथ मिलकर अभिमन्यु को छल पूर्वक मारा था | उसके बदले में अर्जुन ने कर्ण के पुत्र वृशसेना (Vrishasena) को युद्ध में मारा था | फिर भी कर्ण के मन में किसी प्रकार का बदले की भावना नहीं थी

कर्ण की युद्ध के प्रति निष्ठा

महाभारत के युद्ध के समय जब कर्ण और अर्जुन के बीच युद्ध चल रहा था तो उस वक्त अश्वसेना नामक नाग कर्ण के बाण पर आ कर बैठ गया और कर्ण से बोला की तुम बाण चलाओ और मै बाण पर लिपटा रहूँगा और अर्जुन को काट लूँगा क्युकी अर्जुन द्वारा खंडव-परस्त के जंगलो में आग लगाने के कारण मेरी माँ उसमे जल गई थी | और मुझे इसका बदला लेना है | कर्ण ने ऐसा ही किया परन्तु कृष्ण ने रथ को थोडा नीचे झुका दिया जिससे अर्जुन बच गया, अश्वसेना ने पुनः एसा करने को कर्ण से बोला, तो इसपर कर्ण ने साफ यह कह कर मना कर दिया और कहा की युद्ध के दरमियान किसी योधा पर एक ही बाण का दुबारा इस्तेमाल मेरी फितरत में नहीं है, तुम जाओ और अर्जुन को मारने का कोई और उपाय ढूंड लो |

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