सदियों पूराना गागरोन का जल दुर्ग से यहाँ आज भी हुक्का पीने की आवाजें आती हैं

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राजस्थान और प्राचीन मालवा के पठारी क्षेत्र में स्थित झालावाड़ का गागरोन किला अपने आप में बेहद खास है। सदियों पूराना गागरोन का जल दुर्ग आहू और कालीसिन्ध नदी के संगम स्थल पर मुकन्दरा पर्वत मालाओं की सुदृढ चट्टानों पर बना हुआ है। यह किला 6 साल पहले यानि 21 जून 2013 को विश्व धरोहर में शामिल हुआ था। गागरोन का किला अन्य किलों की अपेक्षा अधिक विशेषताओं वाला है।

पांच लक्षण एक साथ संजोने वाला भी यही एक मात्र दुर्ग है-

  1. इस दुर्ग के तीनो गहरा बहता पानी है
  2. किले मे दुर्गम पथ
  3. चौतरफा विशाल खाई
  4. मजबूत चट्टानों के उपर बना परकोटा लेकिन दुर्ग मे नीव नही है
  5. जल संचय का प्रबन्ध

इन सभी विशेषताओं को देखकर इसे आपने आप में इकलौता किला कहा है। मध्य काल मे इस किले को कठहार का बिचला मोती कहकर प्रचलित किया गया। गागरोन के दुर्ग के निर्माण के बारे मे कई मान्यता है। मूशी प्रेमचन्द के अनुसार राजा गोगा चोहान ने रणथंभौर लूटकर अर्जित धन से इसका निर्माण किया था। इसी प्रकार दूसरी मान्यता के अनुसार एतिहासिक परम्परा के अनुसार पूर्व में गागरोन पर डोड राजपूत बीजलदेव का शासन था, उसी के नाम पर इसका नाम डोडगढ या धूलरगढ रहा। इसके अन्तर्गत बारह परगाने थे। बीजलदेव का विवाह बूंदी के खटखड के राजा पिलपिजर खीची की पुत्री ओर देवन सिंह की बहन गंगा बाई के साथ हुआ था। बाद मे किसी षडयंत्र कर देवल सिंह ने धूलरगढ पर चढाई कर दी। बहनोई बीजलदेव को मार दिया ओर गगाबाई सती हो गई बाद मे देवन सिंह ने अपनी बहन की याद मे किले का गंगारमण या गागरून रखा। इस घटना का समय 1250 ईस्वी माना जाता है।

गागरोन

किले में है सूफी संत हमीदुद्दीन चिश्ती की दरगाह-

गागरोन के खीची वंश के संस्थापक भी देवन सिंह को माना जाता है। इसके अधीन मालवा के 52 परगाने थे। इसके बाद यही का शासन राजा चडपाल रहा। इस प्रकार खीचीयो के एक से बढकर एक कई वीर एव प्रतापी शासक हुए। देवन सिंह एव चडपाल के बाद 1303 मे गागरोन के राजा जैतासी हुए थे। जिन्होंने मालवा के सुल्तान कमालुद्दीन को मारा था। जैतसी के समय अलाउद्दीन खिलजी ने गागरोन पर अक्रमण किया, लेकिन जैतसी ने उसका सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया। इस प्रतिरोध मे मालवा के शासक महलक देव ने जैतसी खीची की बहुत सहायता की था। जैतसी खीची के समय सूफी संत हमीदुद्दीन चिश्ती का आगमन हुआ, जिनकी गागरोन दुर्ग मे आज भी विशाल दरगाह है।

किले में संत पीपा जी का भी है स्थान-

जैतसी खीची के बाद गागरोन मे साडन सिह व उसके बाद सावंत सिंह राजा हुए. उसके बाद क्रोध सिंह उर्फ कडवा राव गागरोन के शासन बने। कडवा राव के बाद गागरोन राज्य उनके बडे पुत्र राजा प्रताप राव के हिस्से में आया। राजा प्रताप राव के सारा राजपाट एव वैभव त्याग कर काशी के सत रामानंद का शिष्यत्व धारण किया। वे देशभर मे संत पीपा के रूप मे जाने जाते है। आज भी संत पीपा जी का स्थान गागरोन मे स्थित है सत पीपा दिल्ली के सुल्तान फिरोज तुकलक ने गागरोन पर आक्रमण किया, लेकिन उसे पराजय का सामना करना पडा प्रतावराव (सत पीपा) के बाद गागरोन राज्य का शासन उसने भतीजे कल्याण राव के पास आया कल्याण राव के बाद गागरोन का शासन भोजराज के पास आया।

1443 ई में हुआ गागरोन का सबसे विराट युद्ध एवं जौहर-

भोजराज के बाद उनके पुत्र अचलदास खीची गागरोन का शासक बने। इनके कार्यकाल मे गागरोन का सबसे विराट युद्ध एव जौहर हुआ था। 1443 ई में माडू के शासन सुल्तान होशलशाह गोरी ने एक विशाल सेना के साथ गागरोन पर हमला कर दिया। इस युद्ध मे गोरी के साथ 84 हाथी, 30 हजार घुड़सवार व हजारों पैदल योद्धा थे। उसकी फौज मे उज्जैन, धार, खेरला के अमीर, गोरी के पुत्र, बूंदी का राजा, देवडा हिन्दू राव, मालदेव द्वितीय व सभर सिंह प्रथम शामिल थे। राजा अंचलदास ने अधीनता स्वीकार करने की जगह युद्ध करना उचित समझा। दोनों ओर युद्ध हुआ जो, 13 सितंबर 1433 से 27 सितंबर 1423 तक चला। इसमे अंचलदास वीरतापूवक मुकाबला करते हुए उसको शत्रुओं ने मार डाला। इस पर गागरोन दुर्ग मे उसके अतः पुर की सहस्त्री ललनाओ ने जौहर कर स्वयं को लपटों मे समर्पित कर दिया। ये गागरोन के इतिहास मे सबसे बडा जौहर हुआ है। ये जोहर गागरोन दुर्ग मे मोजूद जोहर कुण्ड मे ही हुआ था, लेकिन जब युद्ध चल रहा था, उस समय अंचल दास ने अपने वश रक्षार्थ अपने पुत्र पाल्हगसी को सुरक्षित रखा। उसको पुत्र को सुरक्षित रखने वालो मे से अंचल दास का एक चारण कवि शिवदास भी थे। जिन्होंने युद्ध का आंखों देखा हाल डिपल भाषा मे अचलदास री वाचनिका मे लिखा है।

कुम्भलगढ प्रशस्ति में उल्लेख-

1423 ई मे गागरोन का शासन गोरी ने अपने पुत्र गजनी खा को सौप दिया। जिन्होने इस दुर्ग को विस्तारित करवाया. जब गजनी खान 1436 मे माडू का शासक बना तो उसे धोखे से विष पिला कर मार दिया। उसी साल महमूद खिलजी मालवा का सुल्तान बना। उसने पहले सरदार बदर खा को गागरोन का दुर्गध्यक्ष बनाया। उनकी मृत्यु के बाद दिलशाद को दुर्गध्यक्ष बनाया। दिलशाद के समय मे अचलदास के पुत्र पाल्हणसी ने पुनः गागरोन किले पर अधिपत्य स्थापित किया। उस समय मेवाड का शासक राजा कुम्भा था राजा कुम्भा पाल्हणसी का मामा था। उधर ‘कुम्भलगढ प्रशस्ति’ के अनुसार राजा कुम्भा ने मालवा विजय के समय लोटते वक्त गागरोन किले को भी विजय कर अपने भतीजे पाल्हणसी को सौप दिया था।

महमूद खिलजी ने 1444 में किया गागरोन पर हमला-

दिल्ली के शासन महमूद खिलजी को जब मेवाड मे सफलता नहीं मिली तो उसका पूरा ध्यान हाडोती एव खीचीवाडे पर केन्द्रित कर लिया। गागरोन दुर्ग हाडोती, मालवा, ओर मेवाड की सीमाओं पर स्थित होने राजनैतिक आकांक्षाओ का चर्चित केंद्र था। इसी कारण महमूद खिलजी ने गागरोन दुर्ग को जीतने का प्रण कर लिया। “मुआसिरे महमूद शाही ” के अनुसार महमूद खिलजी 3 फरवरी 1444 ई मे अपने विशाल सेना लेकर गागरोन पर हमला कर दिया। राजा पाल्हणसी द्वारा दुर्ग की रक्षार्थ पूरी तैयारी कर रखी थी। फिर भी पाल्हणसी ने अपने मामा मेवाड के शासक कुंभा से सहायता मागी। इस पर कुंभा ने धीरजदेव के नेतृत्व मे युद्ध उपकरणों से सुसज्जित दल पहूचाया दोनो ओर से भीषण युद्ध हुआ। सातवे दिन धीरजदेव मारा गया, साथ ही धीरजदेव को मरते देख पाल्हणसी भी युद्ध भूमि छोडकर कुछ साथियों सहित जगल मे निकल गया। जहां बर्बर भीलो ने उसका वध कर दिया। दुर्ग मे धीरजदेव एव पाल्हणसी के मौत के समाचार मिलने पर गागरोन मे भय का वातावरण हो गया। जिसके फलस्वरूप उन्होंने जौहर का आयोजन किया। जिसमे बच्चे, महिलाए, बूढे जन मरे तथा कुछ ने जहर खा लिया। जब जोहर की लपटों से रात मे ही दिन सा उजाला ओर हाहाकार मचा तो शाही सेना ने दुर्ग का दरवाजा तोड कर अन्दर प्रवेश किया ओर दुर्ग पर कब्जा कर लिया।

गागरोन
गागरोन

किले पर रहा कई राजाओं का राज-

इसके बाद इस किले पर राणा सांगा, मुगल बादशाह अकबर, औरंगजेब, खीची राजा रायसल, गोपालदास का भी समय समय पर शासन रहा था। बाद में सिहोड के युद्ध मे कोटा महारावल भीमसिह ने खीचीयो को पराजित कर दिया।तब गागरोन का किला महारावल भीम सिंह के राज्य कोटा मे आया। गागरोन दुर्ग कोटा राज्य के सेनापति जालिम सिह के समय दुर्ग का विकास हुआ। उन्होंने दुर्ग को मराठो, पिण्डारियो एव अन्य संभावित आक्रांताओं से सुरक्षा के लिए यहा अनेक भवनो के आलावा एक विशाल परकोटे का निर्माण करवाया। जो जालिम परकोटे के नाम से कहलाता है। उन्होंने यहा कोटा राज्य की सिक्के ढालने की टकसाल भी स्थापित करवाई थी। झाला के समय इस दुर्ग मे अनेक राजनैतिक कैदियों को भी नजरबंद किया गया था। उस समय कोटा राज्य का सबसे शक्तिशाली दुर्ग गागरोन ही था। 1807 ई मे झाला जालिम सिह ने कोटा राज्य की अग्रेंजो से सन्धि करवाने मे सफलता प्राप्त की जिससे यहा पर अग्रेंजो का प्रभाव हो गया। इसी सन्धि के बाद गागरोन किले की महत्ता समाप्त हो गयी। यह दुर्ग 1947 आजादी से पहले कोटा राज्य मे था। आजादी के बाद कोटा जिले मे आ गया, फिर 1975 मे झालावाड़ जिले के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया।

गागरोन दुर्ग की प्राकृतिक व स्थापत्य की विशेषता-

जहां तक गागरोन दुर्ग के प्राकृतिक परिवेश पर्यटन स्थापत्य निर्माण तथा गौरव गरिमा का प्रश्न है, यह दुर्ग आज भी केवल हाड़ोती मालवा में अपितु समूचे उत्तर भारत में बेजोड़ माना गया है। गागरोन दुर्ग की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी नैसर्गिक सुरक्षा व्यवस्था। उँची पर्वत मालाओं को अभेद्य पाषणी दीवारों, सतत प्रवाहमान नदियों ओर सघन वन ने गागरोन को ऐसा प्राकृतिक सुरक्षा कवच प्रदान किया है, जो भारत के चंद दुर्गो को ही प्राप्त है। मध्य काल मे मेवाड, हाडोती, मालवा गुजरात के सीमावर्ती क्षेत्र मे स्थित होने से गागरोन किले का सामारिक दृष्टि से बडा महत्व था। गागरोन के दुर्ग को अपनी सामारिक स्थित के कारण आक्रांताओं के भीषण अक्रमण झेलना पडा है।

गागरोन

बनावट की अद्भुत विशेषता-

आज भी भारत मे वेल्लोर के जल दुर्ग के बाद गागरोन का दितीय स्थान है। यह दुर्ग अपने अगूठे स्थापत्य व पर्यावरण के कारण भी उत्कृष्ट है। दुर्ग के निर्माण मे भौगोलिक स्थिति का पूरा उपयोग करते हुए इस किले की बनावट पहाडी की बनावट के अनुरूप रखी गई है। गागरोन का दुर्ग पर्वतमालाओ के आकार मे इस प्रकार मिल जाता है कि दूर से सहसा दिखायी नही देता है। अपनी बनावट की इस अद्भुत विशेषता के कारण शत्रु के लिए दुर्ग की स्थिति का दुर से अनुमान लगाना कठिन रहा होगा। वृहदाकार पाषाण शिलाओ से निर्मित इस दुर्ग की ऊंची प्राचीरे, विशालकाय बृर्ज तथा सतत जल से भरी रहने वाली खाई, धुमावदार आन्तरिक एव सुदृढ प्रवेश द्वार इन सबकी वजह से गागरोन किले की सुरक्षा व्यवस्था को किसी दुश्मन के लिए चने चबाने से कम नहीं था।

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