बाल कविता – चूहा

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छत अलमारी तोड़े चूहा
दीवारों को फोड़े चूहा
जहाँ जगह पाता बस फौरन
बिल अपना ही जोड़े चूहा!

चूं-चूं करके सदा फुदकता
हर इक चीज़ झिंझोड़े चूहा
पर पूसी की गन्ध पाते ही
अपने बिल में दौड़े चूहा!

गेहूं-चावल-रोटी-कागज़
कुछ भी तो न छोड़े चूहा
छीके में से कुतर-कुतर के
खाता गरम पकौड़े चूहा!

खींच के खाना बिल में लाता
काम करे न थोड़ा चूहा
इसीलिए तो चुहिया सम्मुख
अपनी मूछ मरोड़े चूहा!

बहुत ज़्यादा दौड़ाता है
शैतानी के घोड़े चूहा
जब फंसता चूहे दानी में
सारी शरारत छोड़े चूहा!!

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